आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक...

आगे माई, जोगिया मोर जगत सुखदायक, दुःख ककरो नहिं देल..

दुःख ककरो नहिं देल महादेव, दुःख ककरो नहिं देल !
एही जोगिया के भाँग भुलैलक, धतुर खोआई धन लेल !१!

आगे माई, कार्तिक गणपति दुई जन बालक, जन भरी के नहिं जान !
तिनक अभरन किछओ न टिकइन, रतियक सन नहिं कान !२!

आगे माई, सोना रूपा अनका सूत अभरन, अपने रुद्रक माल !
अपना मँगलो किछ नै जुरलनी, अनका लै जंजाल !३!

आगे माई, छन में हेरथी कोटिधन बकसथी, वाहि देवा नहिं थोर !
भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि, इहो थिका दिगम्बर मोर !४!

Read more...

गौरी के वर देखि बड़ दुःख भेल...

गौरी के वर देखि बड़ दुःख भेल, सखी बड़ दुःख भेल...

मन के मनोरथ मने रहि गेल, लैलो भिखारी पर सेहो बकलेल !
भोला के कतहुं जगत नाहीं साँक लेल, बरके जे देखि गायनि धुरि गेल!!

हमर गौरी नहिं छथि बकलेल, तिनका एहन बर कोना आनि गेल !
भनहिं विद्यापति बड़ दिन भेल, गौरी मंगन शिव आनन्द भेल !!

Read more...

गौरी तोर अंगना, बड़ अजगुत देखल...

गौरा तोर अंगना !

बर अजगुत देखल तोर अंगना !
एक दिस बाघ सिंह करे हुलना !
दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना !१!
हे गौरा तोर ..............

पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना !
सम्पति मध्य देखल भांग घोटना !२!
हे गौरा तोर ...............

खेती न पथारि शिव गुजर कोना !
मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना !३!
हे गौरा तोर ...............

कार्तिक गणपति दुई चेंगना !
एक चढथि मोर एक मुसना !४!
हे गौर तोर ............

भनहि विद्यापति सुनु उगना !
दरिद्र हरण करू धइल सरना !५!

Read more...

देखु सखी दाइ माइ ठकलक बभना...

देखु सखी दाइ माइ ठकलक बभना !
आइ ठकलक बभना !१!

सुनैत छलियनि जस तिन भुवना !
आव सुनै छी घर नहिं अंगना !२!

भोला के माय नहिं बाप केउ छैन अपना !
गौरीके ननदि सासु दुनू सपना !३!

गौरी तप कैलनि राति दिना !
तिनका एहन वर देल बिधना !४!

भनहिं विद्यापति सुनू हे मैना !
प्राचत सदा शिव भरि अंगना !५!

Read more...

धुर धुर छिया रे छिया..

धुर धुर छिया रे छिया !
एहन बौराहा वर संग कोना जयति धिया !१!

पञ्च मुख बिच सोभित तीन अँखिया !
सह - सह नाचै छैन साँप सखिया !२!

कांख तर झोरा सोभित धतुरा के बिया !
दिगम्बर के रूप देखि साले मयनाके हिया !३!

जौं कदापि धिया के बिष देथिन पिया !
कोह्बरे में मरती धिया के देथुन जिया !४!

भनहिं विद्यापति सुन धिया के मइया !
बैसले ठाम गौरी गुजर करइया !५!

Read more...

महाकवि विद्यापति - (संक्षिप्त जीवनी)

मैथिलीक इतिहास में विद्यापति एकटा एहेंन महाकवि भेलाह, जिनका लs कs हम सभ मैथिल बंधू आय आन - आन भाषा - भाषी के समक्ष गौरवक अनुभव करै छी ! बंगाली समुदाय हिनक कृतिसँ मुग्ध भs कs हिनका बंगाली विद्वान मैंन लेलैथ जे की महाकवि विद्यापति बंगाली नै मिथिलावासी छलाह आ मैथिली में अपन रचना लिखने छलाह !

महाकवि विद्यापतिक जन्म सन १३६० ई. में मधुबनी जिलाक बिस्फी गाम में भेल छलैन ! महाकवि विद्यापति बैशैवारगढ़ मूलक काश्यप गोत्रीय मैथिल ब्रह्मण छलाह ! हिनक बाबूजीक नाम गणपति ठाकुर आ माताजीक नाम हासिनी देवी छलैन ! मिथिलाक प्रसिद्ध विद्वान हरि मिश्र सँ महाकवि विद्यापति शिक्षा ग्रहण कएने छलाह !

महाकवि विद्यापतिक बाबूजी गणपति ठाकुर राजा गनेस्वरक दरबार में मंत्री छलाह ! तें ओ नेत्रहिसँ अपन बाबूजीक संग गणेश्‍वरक दरबारमे जाइत-अबैत छलाह ! गणेश्‍वरक बाद कीर्तिसिंह राजा भेलाह ! अतः ओ हिनका दरबारमे जाए-आबऽ लगलाह ! महाकवि विद्यापति एहि कीर्तिसिंहक नामपर अपन पहिल पुस्तक कीर्तिलता लिखलनि ! एकर भाषा अपभ्रंश (संस्कृत-प्राकृत मिश्रित मैथिली) अछि, जकरा ओ अवहट्ट कहने छथि ! एहि भाषा पर हुनका गर्व सेहो छलनि ! ओहि पुस्तकक पहिल पल्लबक ई पहिल पंक्ति देखल जे सकैत अछि ......

देसिल बयना सब जन मिट्ठा ! तें तैसन जम्पओ अवहट्ठा !! अर्थात देशी भाषा (अपन भाषा) सभके मीठ लागैत छैक !

महाकवि विद्यापति अपन एहि भाषा मे कीर्तिपताका आ कीर्तिलता नामक ग्रंथ लिखलनि ! एहि दुनू ग्रंथक अलावा ओ संस्कृत मे भू-परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, लिखनावली, शैव सर्वस्वसार, गंगावाक्यावली, दानवाक्ययावली, दुर्गा भक्‍ति तरंगिनी, विभाग सार, न्याय पत्तल, ज्योति प्रदर्पण, वर्षकृत्य, गोरक्ष विजय (नाटक ), मणिमंजरी (नाटक) आदि ग्रंथक रचना कएलनि !

एहि तरहें देखल जाय तँ महाकवि विद्यापति मात्र गीतकारे नहि, अपितु यात्रा वृतांत लेखक, कथाकार, पत्र लेखक, निबन्धकार आदि छलाह ! मुदा सभ सँ बेसी हुनका ख्याति भेटलनि गीतकारक रूप मे ! एहि रूप मे ओ अमर भऽ गेलाह ! महाकवि विद्यापतिक जतेक गीतसभ अछि ओहिमे अधिकांश गीत सभ श्रृंगार-रस प्रधान अछि, जाहिमे संस्कृत शास्त्रक अनुसार वय: सन्धि, नखशिख, विरह, अभिसार, सद्य: स्नाता, कौतुक, मान, मिलन आदिक वर्णन बहुत मनमोहक ढ़ग सँ कएल गेल अछि ! एतबे नै "घन घन घनन गुगुर कतऽ बाजए , हन हन कर तुअ काता" वला भैरवी वन्दना सेहो ओ लिखलनि जे वीररसकेँ साकार करैत अछि ! एहि तरहें महाकवि विद्यापति अपन कलमरूपी तरूआरि नीक जकाँ चारू दिस भजलनि ! ईएह कारण अछि जे महाकवि विद्यापतिकेँ जतेक उपाधि देल गेलनि ओतेक उपाधि संसारक कोनो कवि नहि पाबि सकलाह ! आइ ई हमरालोकनिक समक्ष कविकोकिल, कविकण्ठहार, कविरञ्जन, कविशेखर, सुकवि, महाकवि, दशावधान, पञ्चानन , अभिनव जयदेव आदि उपाधिसँ जानल जाइत छथि !
मिथिलाक ई महाकवि सन १४५० ई मे कैलाशवासी भऽ गेलाह !!

Read more...

हम नहिं गौरी शिवके बिआहब...

हम नहिं गौरी शिवके बिआहब, मोरि गौरी रहति कुमारि गे माई !
भुत - प्रेत लै ऐलन बराती, मोर जिय गेल डराई गे माई !१!

गालो चुटकल मोछो पाकल, पैरो में बत्तीस बेमाय गे मई !
गौरी लए भागव गौरी लए परायब, गौरी लय जायव नइहर गे माई !२!

भनहिं विद्यापति - सुनू हे मनाइनि, इहो थिका त्रिभुवन नाथ !
कहत भिखारी दास दोऊ कर जैसी, बस बस होवे विवाह गे माई !३!

हम नहिं गौरी शिवके बिआहब, मोरि गौरी रहति कुमारि गे माई !
भुत - प्रेत लै ऐलन बराती, मोर जिय गेल डराई गे माई !४!

Read more...

जगत विदित बैद्यनाथ, सकल गुण आगर हे..

जगत विदित बैद्यनाथ, सकल गुण आगर हे !
तोहें प्रभु त्रिभुवन नाथ, दया कर सागर हे !१!

अंग भसम शिर अंग, गले बिच विषधर हे !
लोचन लाल विशाल, भाल बिच शशिधर हे !२!

जानि शरण दीनबन्धु, शरण धय रहलहूँ हे !
दया करू मम प्रतिपाल, अगम जल पड़लहूँ हे !३!

सुनाँ सदा शिव गोचर, मम एहि अवसर हे !
कौन सुनत दुःख मोर, छोड़ी तोहि दोसर हे !४!

कार नाट निज दोष, कतेक हम भोखव हे !
तोहें प्रभु त्रिभुवन नाथ, अपने कय राखब हे !५!

Read more...

आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन...

आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन, बदन मलिन भेल तारो !
मन्द वचन तोहि कओन कहल अछि, से न कहिअ किअ मारो !१!

आजुक रयनि सखि कठि बितल अछि, कान्ह रभस कर मंदा !
गुण अवगुण पहु एकओ न बुझलनि, राहु गरासल चंदा !२!

अधर सुखायल केस असझासल, धामे तिलक बहि गेला !
बारि विलासिनि केलि न जानथि, भाल अकण उड़ि गेला !३!

भनइ विद्यापति सुनु बर यौवति, ताहि कहब किअ बाधे !
जे किछु पहुँ देल आंचर बान्हि लेल, सखि सभ कर उपहासे !४!

Read more...

आहे सखि आहे सखि लय जनि जाह...

आहे सखि आहे सखि लय जनि जाह !
हम अति बालिक आकुल नाह !१!

गोट-गोट सखि सब गेलि बहराय !
ब केबाड पहु देलन्हि लगाय !२!

ताहि अवसर कर धयलनि कंत !
चीर सम्हारइत जिब भेल अंत !३!

नहि नहि करिअ नयन ढर नीर !
कांच कमल भमरा झिकझोर !४!

जइसे डगमग नलिनिक नीर !
तइसे डगमग धनिक सरीर !५!

भन विद्यापति सुनु कविराज !
आगि जारि पुनि आमिक लाज !६!

Read more...

अम्बर बदन झपाबह गोरि....

अम्बर बदन झपाबह गोरि !
राज सुनइ छिअ चांदक चोरि !१!

घरे घरे पहरु गेल अछ जोहि !
अब ही दूखन लागत तोहि !२!

कतय नुकायब चांदक चोरि !
जतहि नुकायब ततहि उजोरि !३!

हास सुधारस न कर उजोर !
बनिक धनिक धन बोलब मोर !४!

अधर समीप दसन कर जोति !
सिंदुर सीम बैसाउलि मोति !५!

भनइ विद्यापति होहु निसंक !
चांदुह कां किछु लागु कलंक !६!

Read more...

आसक लता लगाओल सजनी...

आसक लता लगाओल सजनी, नयनक नीर पटाय !
से फल आब परिनत भेल मजनी, आँचर तर न समाय !१!

कांच सांच पहु देखि गेल सजनी, तसु मन भेल कुह भान !
दिन-दिन फल परिनत भेल सजनी, अहुनख कर न गेआन !२!

सबहक पहु परदेस बसु सजनी, आयल सुमिरि सिनेह !
हमर एहन पति निरदय सजनी, नहि मन बाढय नहे !३!

भनइ विद्यापति गाओल सजनी, उचित आओत गुन साइ !
उठि बधाव करु मन भरि सजनी, अब आओत घर नाह !४!

Read more...

चन्दा जनि उग आजुक राति...

चन्दा जनि उग आजुक राति !
पिया के लिखिअ पठाओब पांति !१!

साओन सएँ हम करब पिरीति !
जत अभिमत अभि सारक रिति !२!

अथवा राहु बुझाओब हंसी !
पिबि जनु उगिलह सीतल ससी !३!

कोटि रतन जलधर तोहें लेह !
आजुक रमनि धन तम कय देह !४!

भनइ विद्यापति सुभ अभिसार !
भल जल करथइ परक उपकार !५!

Read more...

जखन लेल हरि कंचुअ अछोहि...

जखन लेल हरि कंचुअ अछोहि !
कत परि जुगुति कयलि अंग मोहि !१!

तखनुक कहिनी कहल न जाय !
लाजे सुमुखि धनि रसलि लजाय !२!

कर न मिझाय दूर दीप !
लाजे न मरय नारि कठजीव !३!

अंकम कठिन सहय के पार !
कोमल हृदय उखडि गेल हार !४!

भनह विद्यापति तखनुक झन !
कओन कहय सखि होयत बिहान !५!

Read more...

उचित बसए मोर मनमथ चोर...

उचित बसए मोर मनमथ चोर !
चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर !१!

बारह बरख अवधि कए गेल !
चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल !२!

बास चाहैत होअ पथिकहु लाज !
सासु ननन्द नहि अछए समाज !३!

सात पाँच घर तन्हि सजि देल !
पिआ देसाँतर आँतर भेल !४!

पड़ेओस वास जोएनसत भेल !
थाने थाने अवयव सबे गेल !५!

नुकाबिअ तिमिरक सान्धि !
पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि !६!

मोरा मन हे खनहि खन भाग !
गमन गोपब कत मनमथ जाग !७!

Read more...

अभिनव पल्लव बइसंक देल...

अभिनव पल्लव बइसंक देल !
धवल कमल फुल पुरहर भेल !१!

करु मकरंद मन्दाकिनि पानि !
अरुन असोग दीप दहु आनि !२!

माह हे आजि दिवस पुनमन्त !
करिअ चुमाओन राय बसन्त !३!

संपुन सुधानिधि दधि भल भेल !
भगि-भगि भंगर हंकराय गेल !४!

केसु कुसुम सिन्दुर सम भास !
केतकि धुलि बिथरहु पटबास !५!

भनइ विद्यापति कवि कंठहार !
रस बझ सिवसिंह सिव अवतार !६!

Read more...

हम जुवती, पति गेलाह बिदेस...

हम जुवती, पति गेलाह बिदेस !
लग नहि बसए पड़उसिहु लेस !!

सासु ननन्द किछुआओ नहि जान !
आँखि रतौन्धी, सुनए न कान !१!

जागह पथिक, जाह जनु भोर !
राति अन्धार, गाम बड़ चोर !२!

सपनेहु भाओर न देअ कोटबार !
पओलेहु लोते न करए बिचार !३!

नृप इथि काहु करथि नहि साति !
पुरख महत सब हमर सजाति !४!

विद्यापति कवि एह रस गाब !
उकुतिहि भाव जनाब !५!

Read more...

माधव ई नहि उचित विचार...

माधव ई नहि उचित विचार !
जनिक एहनि धनि काम-कला सनि से किअ करु बेभिचार !१!

प्रनहु चाहि अधिक कय मानय हदयक हार समाने !
कोन परि जुगुति आनके ताकह की थिक तोहरे गेआने !२!

कृपिन पुरुषके केओ नहि निक कह जग भरि कर उपहासे !
निज धन अछइत नहि उपभोगब केवल परहिक आसे !३!

भनइ विद्यापति सुनु मथुरापति ई थिक अनुचित काज !
मांगि लायब बित से जदि हो नित अपन करब कोन काज !४!

Read more...

कान्ह हेरल छल मन बड़ साध...

कान्ह हेरल छल मन बड़ साध !
कान्ह हेरइत भेलएत परमाद !१!

तबधरि अबुधि सुगुधि हो नारि !
कि कहि कि सुनि किछु बुझय न पारि !२!

साओन घन सभ झर दु नयान !
अविरल धक-धक करय परान !३!

की लागि सजनी दरसन भेल !
रभसें अपन जिब पर हाथ देल !४!

न जानिअ किए करु मोहन चारे !
हेरइत जिब हरि लय गेल मारे !५!

एत सब आदर गेल दरसाय !
जत बिसरिअ तत बिसरि न जाय !६!

विद्यापति कह सुनु बर नारि !
धैरज धरु चित मिलब मुरारि !७!

Read more...

सासु जरातुरि भेली...

सासु जरातुरि भेली, ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली !
तैसन न देखिअ कोई, रयनि जगाए सम्भासन होई !१!

एहि पुर एहे बेबहारे, काहुक केओ नहि करए पुछारे !
मोरि पिअतमकाँ कहबा, हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा !२!

पथिक, कहब मोर कन्ता, हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता !
भनइ विद्यापति गाबे, भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे !३!

Read more...

कुंज भवन सएँ निकसलि रे...

कुंज भवन सएँ निकसलि रे रोकल गिरिधारी !
एकहि नगर बसु माधव हे जनि करु बटमारी !१!

छोड कान्ह मोर आंचर रे फाटत नब सारी !
अपजस होएत जगत भरि हे जानि करिअ उधारी !२!

संगक सखि अगुआइलि रे हम एकसरि नारी !
दामिनि आय तुलायति हे एक राति अन्हारी !३!

भनहि विद्यापति गाओल रे सुनु गुनमति नारी !
हरिक संग कछु डर नहि हे तोंहे परम गमारी !४!

Read more...

कंटक माझ कुसुम परगास...

कंटक माझ कुसुम परगास !
भमर बिकल नहि पाबय पास !१!

भमरा भेल कुरय सब ठाम !
तोहि बिनु मालति नहिं बिसराम !२!

रसमति मालति पुनु पुनु देखि !
पिबय चाह मधु जीव उपेंखि !३!

ओ मधुजीवि तोहें मधुरासि !
सांधि धरसि मधु मने न लजासि !४!

अपने मने धनि बुझ अबगाही !
तोहर दूषन बध लागत काहि !५!

भनहि विद्यापति तओं पए जीव !
अधर सुधारस जओं परपीब !६!

Read more...

चानन भेल विषम सर रे....

चानन भेल विषम सर रे, भुषन भेल भारी !
सपनहुँ नहि हरि आयल रे, गोकुल गिरधारी !१!

एकसरि ठाठि कदम-तर रे, पछ हरेधि मुरारी !
हरि बिनु हृदय दगध भेल रे, झामर भेल सारी !२!

जाह जाह तोहें उधब हे, तोहें मधुपुर जाहे !
चन्द्र बदनि नहि जीउति रे, बध लागत काह !३!

कवि विद्यापति गाओल रे, सुनु गुनमति नारी !
आजु आओत हरि गोकुल रे, पथ चलु झटकारी !४!

Read more...

कि कहब हे सखि रातुक बात...

कि कहब हे सखि रातुक बात !
मानक पइल कुबानिक हाथ !१!

काच कंचन नहि जानय मूल !
गुंजा रतन करय समतूल !२!

जे किछु कभु नहि कला रस जान !
नीर खीर दुहु करय समान !३!

तन्हि सएँ कइसन पिरिति रसाल !
बानर-कंठ कि सोतिय माल !४!

भनइ विद्यापति एह रस जान !
बानर-मुह कि सोभय पान !५!

Read more...

कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल...

कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल !
चरन-चपल गति लोचन लेल !१!

अब सब अन रह आँचर हाथ !
लाजे सखीजन न पूछय बात !२!

कि कहब माधव वयसक संधि !
हेरइत मानसिज मन रहु बंधि !३!

तइअओ काम हृदय अनुपाम !
रोपल कलस ऊँच कम ठाम !४!

सुनइत रस-कथा थापय चीत !
जइसे कुरंगिनि सुय संगीत !५!

सैसव जीवन उपजल बाद !
केओ नहि मानय जय अवसाद !६!

विद्यापति कौतुक बलिहारि !
सैसव से तनु छोडनहि पारि !७!

Read more...

कि कहब हे सखि आजुक रंग...

कि कहब हे सखि आजुक रंग !
सपनहिं सूतल कुपुरुप संग !१!

बड सुपुक्ख बलि आयल घाइ !
सूति रहल मोर आंचर झंपाइ !१!

कांचुलि खोलि आंलिगल देल !
मोहि जगाय आपु जिंद गेल !२!

हे बिहि हे बिहि बड दुम देल !
से दुख हे सखि अबहु न गेल !३!

भनई विद्यापति एस रश इंद !
भेक कि जान कुसुम मकरंद !४!

Read more...

के पतिआ लय जायत रे...

के पतिआ लय जायत रे, मोरा पिअतम पास !
हिय नहि सहय असह दुखरे, भेल माओन मास !१!

एकसरि भवन पिआ बिनु रे, मोहि रहलो न जाय !
सखि अनकर दुख दारुन रे, जग के पतिआय !२!

मोर मन हरि लय गेल रे, अपनो मन गेल !
गोकुल तेजि मधुपुर बसु रे, कत अपजस लेल !३!

विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन मास !
आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास !४!

Read more...

जाइत देखलि नहायलि गोरी..

जाइत देखलि नहायलि गोरी !
कल सएँ रुप धनि आनल चोरी !१!

केस निगारहत बह जल धारा !
चमर गरय जनि मोतिम-हारा !२!

तीतल अलक-बदन अति शोभा !
अलि कुल कमल बेढल मधुलोभा !३!

नीर निरंजन लोचन राता !
सिंदुर मंडित जनि पंकज-पाता !४!

सजल चीर रह पयोधर-सीमा !
कनक-बेल जनि पडि गेल हीमा !५!

ओ नुकि करतहिं जाहि किय देहा !
अबहि छोडब मोहि तेजब नेहा !६!

एसन रस नहि होसब आरा !
इहे लागि रोइ गरम जलधारा !७!

विद्यापति कह सुनहु मुरारि !
वसन लागल भाव रुप निहारि !८!

Read more...

अभिनव कोमल सुन्दर पात...

अभिनव कोमल सुन्दर पात !
सगर कानन पहिरल पट रात !१!

मलय-पवन डोलय बहु भांति !
अपन कुसुम रसे अपनहि माति !२!

देखि-देखि माधव मन हुलसंत !
बिरिन्दावन भेल बेकत बसंत !३!

कोकिल बोलाम साहर भार !
मदन पाओल जग नव अधिकार !४!

पाइक मधुकर कर मधु पान !
भमि-भमि जोहय मानिनि-मान !५!

दिसि-दिसि से भमि विपिन निहारि !
रास बुझावय मुदित मुरारि !६!

भनइ विद्यापति ई रस गाव !
राधा-माधव अभिनव भाव !७!

Read more...

जौवन रतन अछल दिन चारि..

जौवन रतन अछल दिन चारि !
से देखि आदर कमल मुरारि !१!

आवे भेल झाल कुसुम रस छूछ !
बारि बिहून सर केओ नहि पूछ !२!

हमर ए विनीत कहब सखि राम !
सुपुरुष नेह अनत नहि होय !३!

जावे से धन रह अपना हाथ !
ताबे से आदर कर संग-साथ !४!

धनिकक आदर सबतह होय !
निरधन बापुर पूछ नहि कोय !५!

भनइ विद्यापति राखब सील !
जओ जग जिबिए नब ओनिधि भील !६!

Read more...

बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे..

बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे !
छाड़इते निकट नयन बह नीरे !१!

कर जोड़ि बिनमञो विमलतरङ्गे !
पुन दरसन होअ पुनिमति गङ्गे ! २!

एक अपराध छेँओब मोर जानी !
परसल माए पाए तुअ पानी !३!

कि करब जप तप जोग धेआने !
जनम सुफल भेल एकहि सनाने !४!

भनइ विद्यापति समन्दञो तोही !
अंत काल जनु बिसरह मोही !५!

Read more...

सैसव जौवन दुहु मिलि गेल...

सैसव जौवन दुहु मिलि गेल !
स्रवनक पथ दुहु लोचन लेल !१!

वचनक चातुरि लहु-लहु हास !
धरनिए चाँद कएल परगास !२!

मुकुर हाथ लए करए सिङ्गार !
सखि पूछए कैसे सुरत-बिहार !३!

निरजन उरज हेरइ कत बेरि !
बिहुसए अपन पयोधर हेरि !४!

पहिल बदरि सम पुनु नवरङ्ग !
दिने-दिने मदन अगोरल अङ्ग !५!

माधव देखल अपरुब बाला !
सैसव जौवन दुहु एक भेला !६!

विद्यापति कह तुहु अगेआनि !
दुहु एक जोग इह के कह सयानि !७!

Read more...

जय जय भैरवि असुर-भयाउनि..

जय जय भैरवि असुर-भयाउनि
पशुपति - भामिनी माया
सहज सुमति वर दिअओं गोसाउनि
अनुगत गति तुअ पाया

वासर रैन शवासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूडा
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओं उगिलि कैल कूड़ा

सामर वरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फूल कोका
कट कट विकट ओठ फुट पाँड़रि
लिधुर फेन उठ फोका

घन घन घनन नुपुर कत बाजय
हन हन कर तुअ काता
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरि जुनी माता

Read more...

  © Vidyapati Geet. All rights reserved. Blog Design By: Jitmohan Jha (Jitu)

Back to TOP